पाठ्यक्रम आयोजन एवं पाठ्यक्रम प्रकारों की विवेचना


आयोजन वह ढंग है जिसको अपना कर सीखने के अनुभवों को संगठित तथा निर्मित
किया जाता है। सेलर एवं विलियम ने पाठ्यक्रम आयोजन का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा
है-पाठ्यक्रम वह ढाँचा है जिसका विद्यालय में शैक्षिक अनुभवों को चुनने, नियोजित करने
तथा कार्यान्वित करने में प्रयोग किया जाता है।
जेम्स एम. ली. के अनुसार, पाठ्यक्रम आयोजन के दो भेद हैं-
(अ) अंशों में विभाजित आयोजन,
(च) एकीकृत आयोजन।
(अ) अंशों में विभाजित आयोजन- इसमें प्रत्येक विषय को पृथक रूप से पढ़ाया
जाता है। साथ ही विषयों को अपरिवर्तनीय ढंग से पढ़ाया जाता है। इसके अनुसार शिक्षण
पूर्णतः सम्पूर्ण कक्षा समूह के रूप में किया जाता है। इसमें निर्देशात्मक प्रक्रिया दृढ़ और
परम्परागत होती है।
(ब) एकीकृत आयोजन– इसमें विषय-वस्तु की पृथकता को समाप्त करके
अध्ययन की जाने वाली समस्या से विषयों को एकीकृत किया जाता है। इसमें शिक्षक छात्र
की सहयोगी क्रियाओं, नियोजन आदि को स्थान प्राप्त है। इसमें सम्पूर्ण कक्षा समूहों के
अतिरिक्त वैयक्तिक अध्ययन तथा छोटे-छोटे समूहों के कार्यों को स्थान प्रदान किया जाता
है। इसमें निर्देशात्मक प्रक्रिया लचीली होती है।

पाठ्यक्रम के प्रकार



उक्त दोनों प्रकार के आयोजन के आधार पर पाठ्यक्रम के निम्नलिखित प्रकार निर्धारित
किये गये हैं

  1. शास्त्रीय पाठ्यक्रम- यह शिक्षा के प्रति परम्परागत दृष्टिकोण रखता है। इसके
    द्वारा आध्यात्मिक तथा नैतिक जीवन के विकास पर बल दिया जाता है। इस प्रकार केपाठ्‌यक्रम का सूत्रपात प्राचीन यूनान तथा भारत के विद्यालयों
  2. बालकों पर आधारित पाठ्यक्रम पाठ्यक्रम में विषयों की तुलना में बालकों
    को विशेष महत्व दिया जाता है। इस पाठ्‌यक्रम का निर्माण बालकों की विभिन्न रुचियों,
    आवश्यकताओं, क्षमताओं तथा योग्यताओं के अनुरूप किया जाता है, जिससे उसके व्यक्तित्व
    का सर्वांगीण विकास हो सके। किन्कार गार्टन, मॉन्टेसरी तथा योजना पद्धतियाँ आदि इस प्रकार
    के पाठ्यक्रम के ही उदाहरण है।
  3. सुसम्बन्धित पाठ्यक्रम – सुसम्बद्ध पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम को कहते हैं। जिसमे
    विभिन्न विषयों को अलग-अलग न पढ़ाकर एक-दूसरे से सम्बन्धित करके पढ़ाने की व्यवस्था
    हो। मह ज्ञान की महत्वपूर्ण इकाई है। इसलिये सुसंबद्ध पाठ्‌यक्रम में इस बात पर विशेष बल
    दिया जाता है कि बालक के समक्ष ज्ञान को विभिन्न विषयों को अलग अलग न करके
    सम्बन्धित रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिये।
  4. कोर-पाठ्यक्रम कोर – पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम को कहते है जिसमें अनिवार्य
    तथा ऐच्छिक दोनों विषय होते हैं। अनिवार्य विषयों का अध्ययन करना प्रत्येक बालक के लिये
    आवश्यक होता है। इसके विपरीत ऐच्छिक विषयों को व्यक्तिगत रूढ़ियों तथा क्षमताओं के
    अनुरूप पढ़ा जा सकता है। इस पाठ्यक्रम का प्रचलन अमेरिका में है। संक्षेप में, हम कह
    सकते हैं कि कोर पाठ्यक्रम का उ‌द्देश्य व्यक्ति तथा समाज दोनों का ही विकास करना है।
    इस पाठ्यक्रम के अन्तर्गत अनेकों विषयों को एक साथ पढ़ा जा सकता है। इसके साथ ही
    साथ इसमें विभिन्न विषयों को पढ़ाने का समय भी निश्चित होता है।
  5. शिल्पकला पर आधारित पाठ्यक्रम-शिल्पकला पर आधारित पाठ्यक्रम से
    तात्पर्य उस पाठ्‌यक्रम से है जिसमें शिल्पकलाओं यथा बुनाई, कताई, चमड़े तथा लकड़ी के
    काम आदि को केन्द्र मानकर अन्य विषयों की शिक्षा दी जाती है। भारत में आधुनिक बेसिक
    शिक्षा में इस प्रकार के पाठ्यक्रम का बहुत अधिक महत्व है।
  6. अनुभव पर आधारित पाठ्यक्रम- अनुभव पर आधारित पाठ्यक्रम उस पाठ्यक्रम
    को कहते हैं जिसमें बालक के विकास के लिये अनुभवों को बहुत अधिक महत्व दिया जाता
    है। अन्य शब्दों में, अनुभव आधारित पाठ्यक्रम विषयों की अपेक्षा अनुभवों पर आधारित
    होता है।
  7. क्रिया प्रधान पाठ्यक्रम- क्रिया प्रधान पाठ्यक्रम, क्रिया या कार्य को आधार
    बनाता है। इस पाठ्‌यक्रम में भिन्न-भिन्न प्रकार के कायों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।
    जॉन दी.बी. के अनुसार, कार्य या क्रिया पर आधारित पाठ्यक्रम के माध्यम से बालक समाज
    उपयोगी कार्यों को करने में रुचि लेते हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होता
    है। किलपेट्रिक ने पाठ्‌यक्रम के संबंध में ड्युकी के विचारों का उल्लेख करते हुए लिखा
    है-शिक्षा खण्डित एवं निर्जीव पाठ्‌यक्रम, जिसमें प्रत्येक शैक्षिक स्तर के लिए विशेष विषय
    विहित हो, प्रदान नहीं की जा सकती है। पाठ्यक्रम में बास्तविक छात्रों को वास्तविक समस्याओं
    के समाधान में संलग्न है, की एकीकृत क्रियाएँ निश्चित होनी चाहिए। समाधान के लिए उनकी
    खोव उनको कुछ परम्परागत विषयों की ओर अग्रसर करेगी, परन्तु वे जीवन की क्रियाओं
    से स्वतन्त्र होकर ज्ञान के पृथक समूहों के रूप में अध्ययण नहीं किये जायेंगे। अतः विद्यालय
    में चलने बाली भ्रत्येक अर्थपूर्ण क्रिया माठ्यक्रम का निर्माण करती है।

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