पाठ्यक्रम : अर्थ, प्रकृति एवं प्रकार(Curriculum: Meaning, Nature and Types)

प्रश्न १. पाठ्यक्रम से क्या तात्ययं है? पाठ्यक्रम की शिक्षा में क्या भूमिका है?
पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिए।

अथवा

पाठ्यक्रम कलाकार (अध्यापक) के हाथ में वह साधन है जिससे वह
अपने स्टूडियो (स्कूल) में अपनी सामग्री (विद्यार्थी) को अपने आदर्श
(उ‌द्देश्य) के अनुसार ढालता है। कनिंघम के इस कथन पर चर्चा
कीजिए।

उत्तर- पाठ्यक्रम का अर्थ यदि हम पारस्परिक शैली में देखें तो इससे सामान्य अर्थ लिया
जाता है, छात्रों हेतु निर्धारित विषय-वस्तु अर्थात् विशेष कक्षा को निश्चित समयान्तराल में सामग्री
का जितना भाग पढ़ाया जाना है, उसे उस कक्षा का पाठ्‌यक्रम कहा जाता है। इस प्रकार शिक्षण
उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु जो विषय वस्तु शिक्षक सत्र भर पढ़ाता है, वही पाठ्‌यक्रम कहा जायेगा,
किन्तु आधुनिक समय में पाठ्यक्रम शब्द के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन आया है, जिससे
उपर्युक्त पारम्परिक अर्थ बिल्कुल संकुचित एवं समाप्त कर दिया है। इसके स्पष्ट अर्थ की
व्याख्या करने हेतु पूर्व में इसके शाब्दिक अर्थ पर दृष्टिपात करना आवश्यक प्रतीत होता है।


(१) पाठ्यक्तम शब्द का अर्थ-

पाठ्‌यक्रम शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘क्यूरीरे’ (CURRERE) से मानी
जाती है। इसी से अंग्रेजी शब्द ‘कररीकुलम’ बना प्रतीत होता है। ‘कुरीरे’ शब्द का लैटिन भाषा
में तात्पर्य है- ‘रेसकोर्स’ (अर्थात् दौद्ध का मैदान)। अंग्रेजी शिक्षाविदों ने इसी शब्द से
कररीकुलम (CURRICULUM) को उत्पत्ति मानकर इसे निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित
कर दिया है-
“पाठ्यक्रम उस दौड़ के मैदान (रेसकोर्स) की भाँति है, जिसमें शिक्षक एवं छात्र-
दोनों परस्पर साम्य गति बनाये हुए दौड़ते हैं।”

अर्थात् शिक्षक तथा छात्र-दोनों निश्चित अवधि में निश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु
सम्पूर्ण सत्र, पाठ्‌यक्रम समापन की गति से दौड़ने का प्रयास करते रहते हैं।


(ii) पाठ्यक्रम की अन्य प्रचलित परिभाषाएँ

सर्वाधिक प्रचलित पाठ्यक्रम की परिभाषा कनिंघम महोदय ने प्रस्तुत की है। इस
परिभाषा के अनुसार-
“पाठ्यक्रम कलाकार (शिक्षक) के हाथ में एक यन्त्र है, जिससे यह अपनी मूल-
वस्तु (छात्र) को अपनी योग्यता एवं आदर्श (लक्ष्यी) के अनुरूप अपनी प्रयोगजाला
(विद्यालय) में आकार प्रदान करता है।”

क्रॉनवर्ग ने पाठ्यक्रम को परिभाषित करते हुए लिखा है-
“पाठ्यक्रम में, व्यापक रूप में, समस्त विद्यालय का वातावरण समाहित रहता है, इस
वातावरण में विद्यालय द्वारा छात्रों को प्रदान किये जाने वाले समस्त कोर्स एवं क्रियाएँ, पाउन-
बाचन तथा समुदाय अन्तर्निहित रहती है।”

भारतीय माध्यमिक शिक्षा आयोग के शब्दों में पाठ्यक्रम की परिचाषा को निम्न रूयं
में प्रस्तुत किया जा रहा है-
“पाठ्यक्रम का अर्थ केवल उन सैद्धान्तिक विषयों से नहीं है जो कि विद्यालय में,
पारम्परिक ढंग से पढ़ाये जाते हैं, किन्तु में तो छात्र अनुभवों की सगग्रता के परिचायक है
जिसमें विद्यालय, कक्षाकक्ष, पुस्तकालय, कार्यशाला, प्रयोगशाला, खेल का मैदान, शिक्षक-
शिष्य सम्बन्ध व्यक्त किये जाते हैं। इस प्रकार से विद्यालय का सम्पूर्ण जीवन ही पाठ्‌यक्षाग
के रूप में उपस्थित होता है। यह छात्रों के सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करता है, उनके सन्तुलित
व्यक्तित्व विकारा में सहायता करता है।”
उपर्युक्त सभी परिभाषाओं के आधार पर पाठ्यक्रम शब्द की निम्नलिखित विशेषताएँ
हमारे समक्ष उपस्थित होती हैं-

  1. पाठ्यक्रम शिक्षण लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन है।
  2. पाठ्यक्रम, छात्र अनुभवों की समग्रता है।
    ४. पाठ्यक्रम, औपचारिक एवं अनौपचारिक विद्यालयी अनुभवों का संगठन है।
  3. पाठ्यक्रम कक्षीय शिक्षण उ‌द्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक है।
  4. पाठ्यक्रम एक व्यापक सम्प्रत्यय है जो कक्षा में तथा कक्षा के बाहर भी अनुभबो
    को एकत्रित करता है।
  5. पाठ्यक्रम एक जटिल, गहन तथा विशिष्ट सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक
    स्थिति का प्रतिविम्व है।
  6. किसी भी पाठ्यक्रम के संगठन के मौलिक तत्व निम्नलिखित होते है दार्शनिक,
    ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिय, आर्थिक आदि।
    पाठ्यक्रम की शिक्षा में भूमिका-
    पाठ्यक्रम की शिक्षा में भूमिका निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट है-
  7. प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सामाजिक क्षमताओं का विकास करना इस प्रकार के नागरिकों को तैयार करना है, जो प्रजातंत्र को नेतृत्व प्रदान कर सके।
  8. नागरिकों को तैयार करना है, जो प्रजातंत्र को नेतृत्व प्रदान कर सके।
  9. इसकी आवश्यकता एवं महत्व विद्यार्थियो को भावी जीवन को अच्छे तरीके से
    जीने के लिये तैयार करना भी है।
  10. पाठ्यक्रम का महत्व इसलिये भी है, क्योंकि इसके द्वारा मानबीय गुणों का विकास
    होता है।
  11. इसका महत्व सामाजिक आवश्यकताओं के लिए नागरिकों को तैयार करना तथा
    इसके साथ ही साथ सौन्दर्य की अनुभूति आदि गुणों का विकास करना है।
  12. मानसिक पक्षों का प्रशिक्षण तथा विकास करने के लिये विभिन्न विषयों के शिक्षण
    द्वारा गानसिक पक्षों का प्रशिक्षण किया जाता है।
  13. पाठ्यक्रम की आवश्यकता एवं महत्व व्यवसाय तथा नौकरियों के लिये तैयार
    करना है।
  14. इसका महत्व विद्यार्थियों में रुचियों उत्पन्न, करने के लिए उनकी क्षमताओं के
    अनुरूप उनका विकास करना।
  15. विद्यार्थियों को व्यवसायों को करने के लिए प्रशिक्षण देना नयी शिक्षा नीति की
    प्राथमिकता है।

पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले कारक-


पाठ्यक्रम का निर्माण शैक्षणिक तथा सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप हों किया जाता
है। इसलिये सामाजिक कारक तथा शिक्षक पाठ्यक्रम को आवश्यक रूप से प्रभावित करते
हैं। ये कारक निम्नलिखित है-

  1. शिक्षा-व्यवस्था-शिक्षा-व्यवस्था एवं पाठ्यक्रम का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है,
    तथा ये एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। पाठ्यक्रम परिवर्तनशील तथा लचीला रहा है। छोटे
    बच्चों का पाठ्यक्रम अनुभव केन्द्रित एवं माध्यमिक स्तर पर विषय पर केन्द्रित रहा है। शिक्षा
    व्यवस्था के परिवर्तित होने के साथ ही साथ पाठ्यक्रम का प्रारूप भी बदलता रहता है।
  2. शासन पद्धति-शिक्षा के माध्यम से देश तथा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति
    हाती है, लेकिन शासन प्रणाली के बदल जाने पर पाठ्यक्रम का प्रारूप भी बदलना पड़ता है।
    केन्द्र तथा राज्य स्तर पर सरकार के बदलने का प्रभाव पाठ्यक्रम पर आवश्यक रूप से पड़ता
    है। केन्द्रीय सरकार पाठ्यक्रम के प्रारूप को सबसे अधिक प्रभावित करती है। हमारे देश में
    प्रदेश या राज्य के माध्यम से इस प्रकार की व्यवस्था की जाती है। इसलिये शिक्षा का कोई
    राष्ट्रीय प्रारूप नहीं है। सभी प्रदेशों के पाठ्यक्रम का प्रारूप विभिन्न स्तरों पर पृथक पृथक है।
  3. परीक्षा-प्रणाली- परीक्षा प्रणाली भो पाठ्यक्रम को आवश्यक रूप से प्रभावित
    करती है। वस्तुनिष्ठ परीक्षा के पाठ्यक्रम का प्रारूप निबन्धात्मक परीक्षा से अलग होता है।
    निबन्धात्मक परीक्षा में पाठ्य-वस्तु पर आधारित दीर्घ उत्तरीय प्रश्न पूछे जाते हैं, जबकि
    वस्तुनिष्ठ परीक्षा सूक्ष्म पाठ्य वस्तु से लघु उत्तरीय प्रश्नों को पूछा जाता है।
  4. अध्ययन समितियाँ पाठ्यक्रम के स्वरूप का निर्धारण अध्ययन समितियों के
    माध्यम से किया जाता है। अध्ययन समिति के सदस्य समझदारी वगा अनुभव के आधार पर
    पाठ्यक्रम के स्वरूप का निर्माण करते हैं। इसलिये पाठ्यक्रम पर इन सदस्यों की रुचियों,
    अभिवृत्तियों तथा मानसिक क्षमताओं का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है, बयोकि अध्ययन समिति
    के अध्यक्ष ही पाठ्यक्रम का प्रारूप तैयार करते हैं एवं उसे बदल सकते हैं। दूसरे सदस्य तो
    केवल उनका अनुमोदन ही करते हैं।
  5. सामाजिक परिवर्तन- सामाजिक परिवर्तन के अन्तर्गत आर्थिक एवं भौतिक
    परिवर्तन की गति अधिक तेज होने के कारण वे आर्थिक तथा भौतिक परिवर्तन पाठ्यक्रम को
    बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। विज्ञान तथा राकनीकी विकास के कारण सामाजिक जीजन
    अधिक प्रभावित हुआ है। इसलिये व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के साथ ही कम्प्यूटर आदि से
    सम्बन्धित पाठ्यक्रमों का विकास हुआ है। इसके अतिरिक्त सामाजिक एवं पारिवारिक
    परम्परायें तथा अतीत के मूल्य और मान्यतायें भी पाठ्यक्रम के प्रारूप को प्रभाषित करती है।

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